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“सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।। अर्थ :- “सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः” (साभार उपनिषद्)
“समाज में व्याप्त कुरुतियों को दूर करना व मिलजुलकर अथवा समूह बनाकर जिनके माध्यम से हम अपने विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करते हैं। निर्धन और असहाय तक सरकारी योजनाओं का ज्ञान व सिमित साधन उपलब्ध करवाने को संस्था कहते हैं”
संस्था की वेबसाइट पर आप सभी का हार्दिक स्वागत है। मै मुरली मनोहर शर्मा राजस्थान राज्य के चुरू जिले की राजगढ़ तहसील में जसवंतपुरा नामक ग्राम का रहने वाला हु तथा हाल निवासी पिलानी का हु, और मै संस्था का संरक्षक व निर्वर्तमान अध्यक्ष हु।
हमारी संस्था राजस्थान राज्य के झुंझुनूं जिले में पिलानी कस्बे में संचालित है, संस्था का उद्देश्य कर्तव्य सेवा और”
मित्रों हर संस्था को खोलने के पीछे एक कहानी छुपी होती है उसी प्रकार हमारी संस्था के पीछे भी एक कहानी है।
जो इस प्रकार है :-
मेरा बाल्यकाल चूरू जिले में राजगढ़ तहसील के जसवंतपुरा नामक ग्राम में बीता मुझे मेरे पूजनीय पिताजी स्वर्गीय श्री मुकुन्दराम जी तथा पूजनीय माताजी स्वर्गीय श्रीमती सोना देवी के सानिध्य में रहकर मुझे सामाजिक कार्यों में भागीदार बनने का अहो सौभाग्य प्राप्त हुआ इस कारण मेरी सामाजिक कार्यों में भागीदार बनने की मुझे आनंद की अनुभूति होने लगी।
तथा जब मैं पिलानी में अपना घर बनवा रहा था तब मेरे पास यह एक निर्धन श्रमिक आता था। जिसका नाम मूलचंद था (जो दलित समुदाय से था) तब उसकी उम्र 18 से 19 थी। उसकी एक कमजोरी थी वो कभी स्कूल नहीं गया परन्तु उसमें टैलेंट कूट-कूट के भरा हुआ था टैलेंट के साथ-साथ वो बुद्धिमान और समझदार व्यक्तित्व का धनी था। वह माल ढोने का कार्य करने आता था वह एक निर्धन होने के साथ साथ काफी ईमानदार भी था शिक्षा के अभाव के चलते उसे सरकारी योजनाओं का कोई ज्ञान नहीं था उसके टैलेंट को देखते हुए मैंने उसे सरकारी योजनाओं का ज्ञान करवाने व उसको कुशल कारीगर बनाने के उद्देश्य के चलते जब न्यून मजदूरी 30 रुपये हुआ करती थी तब मैंने उसे पिलानी आवास पर संचालित मोनोब्लॉक मोटर वर्क्स में रख लिया मेरे मोटर वर्क्स में उस वक्त तीन कारीगर और थे मनें अपने बड़े कारीगर से कहा हमें इस बच्चे को एक कुशल कारीगर बनाना है हमने उस बच्चे को लेथ – मशीन पर खड़ा करके उसको काम करने के लिए प्रेरित किया तथा वह कुछ दिनों बाद स्वयं एक कुशल कारीगर बनकर उभरा तथा अपने जैसे अन्य बच्चों को मेरे वर्क शॉप पर ट्रेड करने लगा उसके परिणाम स्वरूप उसकी 10 वि क्लास पासआउट कन्या के साथ उसका विवाह संपन्न हुआ।
उस समय सरकार की आंगनबाड़ी योजना में सहायक की मांग की जा रही थी तब वह कन्या भी आंगनबाड़ी सहायक में कार्य करने लगी । ऐसे और अनेक प्रकार के सामाजिक कार्यो के चलते मन में आया एक संस्था का गठन करके हम इस प्रकार के ओर अनेक बच्चों को प्रेरित कर सकते है तथा इस प्रकार की बालिकाओं को सिलाई मशीन से सिलाई सिखाकर जीविकापार्जन के लिए यह हमारें लिए एक प्रेरणा बन गया और हम हमारें सर्किल में दोस्तों से हमने एक समिति (संस्था) का गठन किया गया जिसमें लोक कल्याण कारी कार्य हो सेवा हो शिक्षा हो तथा मानवीय कर्तव्य के आधार पर असमर्थ व्यक्तिओ तक पहुंच सके।
*पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य संस्थापक गायत्री व पंडित दीनदयाल उपाध्याय के साहित्यो से हमे यह प्रेरणा मिली
“जय भारत ! जय वसुधैव कुटुम्बकम”
